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Indus Valley Civilization in Hindi

 वर्षों पुरानी सिंधु सभ्यता  Indus Valley Civilization in hindi or sindhu ghati sabhyata  बीसवीं सदी के द्वितीय दशक तक एक गुमनाम सभ्यता थी अर्थात्

लोग इस कभ्यता के बारे में अपरिचित थे। विद्वानों की धारणा थी कि सिकंदर के आक्रमण 326 ईं0 पू0 के पूर्व India में कोई civilization ही नही थी।

बींसवीं सदी के तृतीय दशक में दो पुरात्वशास्त्रियों दयाराम साहनी और राखालदास बनर्जी ने हड़प्पा (harappan ) तथा 

मोहनजोदडों ( mohenjodaro) के प्राचीन स्थलों से पुरावस्तुएँ प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया कि सिकंदर के आक्रमण के पूर्व भी एक सभ्यता (clivllization) थी, जो अपने समकालीन सभ्यताओं में सबसे विकसित थी।

Founder of Indus valley civilization in Hindi-

सर्वप्रथम चाल्र्स मैसन ने 1826 ईं0 में सैंधव सभ्यता (indus civilization) का पता लगाया, जिसका वर्णन उनके द्वारा 1842 में प्रकाशित पुस्तक में मिलता है।

उसके बाद वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में पुरातत्वविद् दयाराम साहनी ने उत्खनन कर इसके प्रमुख नगर हड़प्पा harappan का पता लगाया।

Time period of Sindhu ghati sabhyata in Hindi

रेडियो कार्बन 14(C14) जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता indus civilization का काल निर्धारण  2500 BC से लकेर 1750 BC तक माना गया है।

Sindhu ghati sabhyata in hindi ka naam kisne diya

सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) को हड़प्पा संस्कृति (harappan civilization) भी कहा जाता है।

इस सभ्यता का नामकरण, हड़प्पा (Harappan) नामक स्थान, जहाँ यह संस्कृति पहली बार खोजी गई थीं के नाम पर किया गया है।

इसका काल निर्धारण लगभग 2600 और 1900 ईसा पूर्व के बीच किया गया है।

इस क्षेत्र में इस सभ्यता से पहले और बाद में भी संस्कृतियाँ अस्तित्व में थीं जिन्हें क्रमश, आरंभिक तथा परवर्ती हड़प्पा कहा जाता है।

इस संस्कृतियों से हड़प्पा सभ्यता को अलग करने के लिए कभी-कभी इसे विकसित हड़प्पा संस्कृति भी कहा जाता है।

Indus valley Geographical area

indus valley civilization in hindi
Indus Valley Civilization in Hindi

इस संस्कृति का उदय ताम्रपाषाणिक पृष्ठभूमि में भारतिय उपमहादेश के पश्चिमोत्तर भाग में हुआ। बाद में सिंध के बहुत से स्थल प्राक्-हड़प्पीय संस्कृति परिपक्व होकर सिंधु और पंजाब में शहरी सभ्यता के रूप में परिणत हुई।

इस परिपक्व हड़प्पा संस्कृति का केन्द्र-स्थल पंजाब और सिंध में, मुख्यतः सिंधु घाटी में पड़ता है। यही से इसका विस्तार प्रारम्भ हुआ।

इसका फैलाव उत्तर में जम्मू (मांडा) से लेकर दक्षिण (महाराष्ट्र के दैमाबाद) में नर्मदा के मुहाने तक और पश्चिम में बलूचिस्तान (मुत्कागेंडोर) के मकरान समुद्र तट से लकर उत्तर-पूर्व में मेरठ तक था।

यह समूचा क्षेत्र के आकार त्रिभूजा के आकार का था। इसका पूरा क्षेत्रफल लगभग 1,299,600 वर्ग किलोमीटर है।

यह उत्तर से दक्षिण लगभग 1100 किमी. तक तभा पूर्व से पश्चिम में लगभग 1600 किमी. तक फैली हुई थी। अभी तक उत्खलल तथा अनुसंधान द्वारा 2800 स्थल ज्ञात किये गए हैं।

नदियों के किनारे बसे हड़प्पा कालीन नगर और उनके उत्खनन कर्ताः

नगर नदी उत्खनन कर्ता
हड़प्पा रावी नदी दयाराम साहनी
मोहनजोदडों सिंधु राखालदास बनर्जी
चन्हूदडों सिंधु अर्नेस्ट मैके
कालीबंगा घग्घर बी.बी. लाल एवं बी.. के. थापर
कोटदीजी सिंधु फजल अहमद खाँ
रंगपुर भादर एस. आर. राव
रोपड़ सरलज यज्ञदत्त शर्मा
लोथल भोगवा एस. आर. राव
आलमगीरपुर हिण्डन खोज-ऑरेल स्टेइन
बनावली सरस्वती आर. एस. बिष्ट

सिंधु घाटी सभ्यता की मुख्य विशेषताएं :-

सिंधु घाटी सभ्यता की मुख्य विशेषताएं निम्नवत् है-

नगर विन्यास पद्धतिः ( town planning of indus valley civilization in hindi )

 Harappan civilisation की विशेषता थी इसकी नगर-योजन प्रणाली। यह जाल पध्दति Grid System पर आधारित है।

नगर में आयाताकार या वर्गाकार चौड़ी गलियां होती थी जो एक-दूसरे को समकोंण पर काटती थी। लगभग सभी नगर दो भागों में विभक्त हैः-

प्रथम भाग में ऊँचें दुर्ग निर्माण थे। इनमें शासन वर्ग निवास करता था लेकिन दूसरे भाग में नगर

या आवास क्षेत्र के साक्ष्य प्राप्त हुए है, जो ज्यादा बड़े हैं। आमतौर पर यहाँ सामान्य नागरिक, व्यापारी, शिल्पकार, कारीगर और श्रमिक वर्ग के लोग निवास करते थे।

हड़प्पा, मोहनजोदड़ों तथा कालींबंगा की नगर योजना लगभग एकसमान होती थी, कालीबांगा व रंगपुर को छोड़कर सभी में पकी हुई ईंटों का प्रयोग हुआ है।

बड़े भवन हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की विशेषता बतलाते हैं। घरों के दरवाजें एवं खिड़कियाँ मुख्य सड़क पर न खुलकर गलियों में खुलती थीं, लेकिन लोथल इसका अपवाद है।

मकान बनाने में कई प्रकार की ईटों का प्रयोग होता था, जिसमें 4, 2,1 ( लंबाई, चौड़ई तथा मोटाई के अनुपात) के आकार की ईंटें ज्यादा प्रचलित थी।

सिंधु घाटी सभ्यता की वास्तुकला –

भारत की सभ्यता में सिंधुवासियों ने ही वास्तुकला का सर्वप्रथम प्रयोग पाया जाता है। जो निम्नवत् है:-

  • सिंधु सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी।
  • सड़कें एक दूसरे को समकोंण पर काटती थी।
  •  भवन दो मंजिले भी थी।
  • दरवाजे सड़कों की ओर खुलते थे।
  • मोहनजोदड़ों की सबसे बड़ी इमारत अन्नागार हैं।
  • फर्श कच्चा होता था केवल कालींबंगा में पक्के फर्श के साक्ष्य मिले हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता की कृषि –

विश्व में कपास का उत्पादन सर्वप्रथम सिन्धुवासियों ने किया था, चूँकिं कपास का उत्पादन सबसे पहले सिंधु क्षेत्र में ही हुआ, इसलिए यूनान के लोग से सिन्डस Sindon कहने लगे जो सिंधु शब्द से निकता है।

 सिंधु सभ्यता के लोग गेहूँ, जौ, राई, मटर आदि अनाज पैदा करते थे। वे दो किस्म का गेहूँ और जौ उगाते थे। बनावाली में मिला जौ बदिंया किस्म का है। इनके अलावा वे तिल और सरसों भी उपजाते थे।

परंतु हडंप्पाकालीन लोथल में रहने वाले हड़प्पाइयों की स्थिती भिन्न रही है। लोथल के लोग 1800 ईं पू. में ही चावल उपजाते थे जिसका अवशेष वहाँ पाया गया है।

मोहेंजोदड़ों और हड़प्पा, में और शायद कालीबंगा में भी अनाज बड़े कोठरों में जमा किया जाता था।

संभवतः किसनों से राजस्व के रूप में अनाज लिया जाता था और यह पारिश्रमिक चुकाने और संकट की घडिंया में काम के लिए कोठरों में जमा किया जाता था।

पशुपालन –

सिन्धुवासी हाथी व घोडे से परिचित थे। किन्तु उन्हें पालतू बनाने में असफल रहे। घोडे का साक्ष्य सुरकोटदा (अस्थि पंजर प्राप्त) से प्राप्त हुआ है।

सिन्धु वासियों को गैंड़ा, बंदर, भालू, खरहा आदि जंगली जानवरों का ज्ञान था और वह शेर का कोई साक्ष्य नहीं  प्राप्त हुआ है।

उन्हें कुबड़ बाला साँड़ विशेष प्रिय था। कुत्ते सुरू से ही पालतू जारवरों में थे। बिल्ली भी पाली जाती थी। गुजरात में बसे हड़प्पाई लोग चावल उपजाते थे और हाथी पालते थे।

व्यापार –

 सिंधु सभ्यता के लोगों के जीवन में व्यापार का बड़ा महत्व था। इसकी पुष्टि हड़प्पा, मोहेंजोदड़ों और लोथल में अनाज के बड़ें-बड़ें कोठारों के पाए जाने से ही नहीं होती, बल्कि भू-भाग में ढेर सारी मिट्टी की मुहरों , एकरूर लिपि और मानकीकृत माप-तोलों के अस्तित्व से भी होती है।

 सिन्धु सभ्यता में मुद्रा का प्रचलन नहीं था, वह वस्तुओं का क्रय-विक्रय वस्तु विनिमय पर आधारित था।

इस सभ्यता के लोग अन्य सभ्यता के लोगों के साथ व्यापार करते थे, जिनका आयात वह मुख्य स्थानों से करते थे। संभवतः हड़प्पा सभ्यात में शिल्पयों और व्यापारियों का शासन था।

 2350 ईं. पू. के आसपास और उसके आगे के मेसोपोटमियाई अभिलेखों में मेलूहा के साथ व्यापारिक संबंध की चर्चा है, मेलुहा सिंधु क्षेत्र का प्राचीन नाम है।

वस्तुओं स्थान
टिन अफगानिस्तान ओर ईरान
तांबा राजस्थान के खेतड़ी से
चांदी अफगानिस्तान और ईरान
सोना अफगानिस्तान एवं दक्षिण भारत
सीसा ईरान, अफगानिस्तान और राजस्थान
लाजवर्द मेसोपोटामिया और अफगानिस्तान

धर्म –

हड़प्पा सभ्यता से मंदिर का कोई अवशेष प्राप्त नहीं हुआ है। लेकिन हड़प्पा में पकी मिट्टी की स्त्री कि मूर्तिकाएँ भारी संख्या में मिली हैं। मोहनजोढड़ों की एक मोहर से स्वस्तिक चिन्ह प्राप्त हुआ है।

हड़प्पा सभ्यता में मुख्य रूप से कूबड़ वाले सांड की पूजा होती थी। हड़प्पा सभ्यता में वृक्षपूजा के साक्ष्य भी मिला है पीपल एवं बबूल की पूजा होती थी। सिन्धु सभ्यता में प्रेतवाद, भक्ति, और पुनर्जन्मवाद के बीज मिलते हैं।

अन्त्येष्टि के प्रकार –

किसी संस्कृत विशेष में रहने वाले लोगों के बीच सामाजिक तथा आर्थिक भिन्नताएँ थीं, सामान्यतः हड़प्पा सभ्यता में अन्त्येष्टि 3 प्रकार से होती थी।

  1. पूर्ण समाधिकरण
  2. आंशिक समाधिकरण
  3. दाह संस्कार

  लोथल से युग्म शवाधान का साक्ष्य मिला है|

(कुछ विद्वान इसको सती प्रथा के रूप में देखते हैं)

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि –

हड़प्पाई लोगों ने भी लेखन कला का आविष्कार किया था। किंतु वह अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। कुछ लोग इसे द्रविड़ या आद्य-द्रविड़ भाषा से जोड़ने का प्रयास करते हैं।

कुछ लोग संस्कृत से, तो कुछ लोग सुमेरी भाषा से लोकिन फिर भी अभी तक इस पढ़ा नहीं जा सका हैं।

सिन्धु लिपि के बारे में सर्वप्रथम विचार करने वाला प्रथम व्यक्ति अलेक्जेंडर कनिंघम थे। लेकिन पढ़ने का सर्वप्रथम प्रयास एल. ए. वैंडल ने किया था।

सिन्धु लिपि भावचित्रात्म है। जिसमें चित्रों के रूप में जैसे मछली, चिड़िया, मानवाकृति आदि चिन्हों मिलते है। यह लिपि दाएं से बाएं को लिखि जीती थी।

हड़प्पारावी नदी के किनारे 1921 में दयाराम साहनी द्वारा खोजा गया।शंख का बना हुआ बैल, नटराज की आकृति वाली मूर्ति प्राप्त हुआ।पैर में सांप दबाए गरूड़ का चित्र, मछुआरे का चित्र प्राप्त।सिर के बल खड़ी नग्न स्त्री का चित्र जिसके गर्भ से पौधा निकला दिखाई दे रहा है। प्राप्त हुआ है।
मोहनजोदड़ोंसिंधु नदी कि किनारे, 1922 में राखलदास बनर्जी द्वारा खोजा गया।
भवन पक्की ईंटों द्वारा निर्मित और सीदीं का साक्ष्य मिला।प्रवेश द्वार गली में, कांसे की एक नर्तकी की मूर्ती प्राप्त।एक श्रृंगी पशु आकृति वालि मोहर प्राप्त।इसे मौत का टीला भी कहा जाता है।
लोथल
 घग्घर नदी के किनारे राजस्थान में स्थितइसका शाब्दिक अर्थ काली चूड़ियाँ है।प्राक्र हड़प्पा एवं विकसित हड़प्पा दोनों के साक्ष्य प्राप्त।एक सींग वाले देवता के साक्ष्य प्राप्त।कपाल में छेद वाले बालक का शव प्राप्त (शल्य क्रिया का उदाहरण)
लोथलभोगवा नदी के किनारे गुजरात में स्थित।गोदीवाडा से साक्ष्य प्राप्त, चावल एवं बाजारा के साक्ष्य प्राप्त।दो मुंह वाले राक्षस के अंल वाली मुद्रा प्राप्त।पंचतंत्र की चालाक लोमड़ी का अंकन प्राप्त।ममी का उदाहरण प्राप्त।बतख, बारहसिंगा, गोरिल्ला के अंकन प्राप्त।
चन्हूदडोंमनके बनाने का कारखाना प्राप्त।ईंट पर बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पद चिन्ह प्राप्त।
बनवालीहरियाणा के हिसार जिले में स्थित।अच्छे किस्म के जौ की प्राप्ती।हल की आकृती वाला खिलौना प्राप्त।
रोपड़पंजाब में सतलज नदी के किनारे स्थित।मानव के साथ कुत्ता के दफनाए जाने का साक्ष्य प्राप्त।
धौलावीरागुजरात के भरूच जनले में स्थितजल प्रबंधन के लिए 16 जलाशयों की प्राप्ती।
सुरकोटदागुजरात के कच्छ में स्थितशॉपिंग कॉम्पलेक्स के साक्ष्य प्राप्त।घोड़े की अस्थियां प्राप्त।

Ram Pal Singh

Hi, This is Ram Pal Singh. I am a Profocinal Blogger and content writer, and Now I am working in the Government Sector in Uttar Pradesh.

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